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International Day of Yoga 2015

International Day of Yoga 2015
Start Date :
Jan 18, 2015
Last Date :
Jun 30, 2015
00:00 AM IST (GMT +5.30 Hrs)
Submission Closed

In December 2014 the United Nations declared 21st June as ‘International Day of Yoga’ after 177 nations across all continents of the world co-sponsored a resolution seeking the ...

In December 2014 the United Nations declared 21st June as ‘International Day of Yoga’ after 177 nations across all continents of the world co-sponsored a resolution seeking the same.

When the resolution was adopted, Prime Minister Narendra Modi expressed immense joy on this and said that Yoga has the power to bring the entire humankind together. It may be recalled that the Prime Minister had mooted such an idea during his speech at the United Nations General Assembly in September 2014.

You are requested to provide inputs on the following aspects relating to the marking of the first ever ‘International Day of Yoga’.

(1) How can the ‘International Day of Yoga’ be celebrated at the UN forum?

(2) Suggest creative ways in which the ‘International Day of Yoga’ can be celebrated at the world stage.

(3) What are ways in which we can mark the ‘International Day of Yoga’ across the length and breadth of India?

Best inputs and suggestions would be sent to the Prime Minister himself and would also be utilized.

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Showing 2681 Submission(s)
ANILKUMAR KHARADE
ANILKUMAR KHARADE 11 years 4 months ago
आदरणीय मोदिजी हमारे गाव का एक किसान राजेन्द्र मोहिते का बेटा कु रुद्राक्ष राजेंद्र मोहिते वय ९ , मु .पो .मांजर्डे तालुका -तासगाव जी -सांगली Maharashtra दो साल से aplastic animia से दो साल से बिमार है उसका bone marrow transplant का operation Lotus hospital and hematology institute नाशिक (महाराष्ट्र ) यहा करणा ही उसके लिये १० लाख इतना खर्च होणे वाला ही उसकी economic condition बहुत खराब है उसे जिंदगी जिने के बजाय आत्महत्या करणे के लिये सोच राहा है आदरणीय मोदिजी आप खुद्ध इसमे help kare
Hrishikesh Mishra
Hrishikesh Mishra 11 years 5 months ago
अब अगर वह पुण्य कर्मी बालक समस्त यज्ञ आहुतियों के अंत में परमात्मा को मिल जाने के सत्य में पूर्ण श्रद्धा वाला होगा तो वह आगे बढ कर अपने ज्ञान'सुर्य' पिता से मिलेगा। ।। ऊँ तत् सत् ।।
Hrishikesh Mishra
Hrishikesh Mishra 11 years 5 months ago
एकमेव सम-दम के सम्मिलित और निरंतर अभ्यास के द्वारा वह धीरे-धीरे चित्रकेतु के उस खोये पुत्र को आत्म निर्मित बंधन में कैद व आनंद रत पाता है। अंतरजगत में उसके सारे साधन अब बेकार साबित होते हैं। प्रयत्न की सीमा आन पडी। अब तो दीन दयाल ही मुक्ति दे सकते हैं। 'मैं' हार गया। अरे प्रभु तो एक पल भी नहीं लगाते!!! वे तो सारे बंधन क्षण भर में काटने में समर्थ हैं। वही चित्रकेतु के इस पुत्र के बंधन तत्काल काट देते हैं। अब अगर वह पुण्य कर्मी बालक समस्त यज्ञ आहुतियों के अंत में परमात्मा को मिल जाने के सत्य
Hrishikesh Mishra
Hrishikesh Mishra 11 years 5 months ago
इस तरह सक्रिय व निस्क्रिय अवस्थाओं से निर्मित २४ घंटे वह एकमेव चित्त वृत्ति निरोध के अभ्यास में रत रहता है
Hrishikesh Mishra
Hrishikesh Mishra 11 years 5 months ago
साथ ही वह इंद्रीय-मन की गति के दमन के अभ्यास द्वारा साक्षी भाव का विकाश आरंभ करता है। (2)इसी प्रकार निद्रा के प्रारम्भ या शारीरिक शिथिलता की अवधि में निर्विचारिता के अभ्यास के लिए अर्द्ध खुले नेत्रों से नाशिका छिद्रों से प्रवेश करती वायु के साथ 'ओ' और निकाश करती वायु के साथ 'म' का मौन उच्चारण करता है। इस अवधि में वह बिना आँखो को घुमाये, दृष्टि से अपने ध्यान को अलग कर दोनों भौहों के मध्य स्थिर करने का अभ्यास करता रहता है।
Hrishikesh Mishra
Hrishikesh Mishra 11 years 5 months ago
(1)क्रिया की अवधि में, सब जीवों में अपने आराध्य परमेश्वर की उपस्थिति का ध्यान। इस अभ्यास को आयाम देते हुए वह क्रमश: समस्त विचारों और क्रियाओं का कारण व कर्ता ईश्वर को मानने की धारणा का स्मृति पर श्रद्धा पूर्वक अंकन करते हुए अनेकानेक नत्थी पहचानों को ईश्वर अंश रूपी सम पहचान वाला बनाता है। इस तरह चित्त के आवेगात्मक विक्षेप की तीव्रता के घटने से सुदूर तम में खोया सनतकुमार अपने पिता के नजदीक आने लगता है।
Hrishikesh Mishra
Hrishikesh Mishra 11 years 5 months ago
महर्षि अंगिरा के आशिर्वाद से उत्पन्न यह चित्रकेतु पुत्र धीरे-धीरे दक्ष हो अनेक विघ्न कारी पहचान रुपी पाखंडों से मुक्त हो सत् की ओर मुडना शुरु करता है। अब उसे क्रिया व आराम की अवस्थाओं में दो अलग-अलग कार्य करने पडते हैं।
Hrishikesh Mishra
Hrishikesh Mishra 11 years 5 months ago
आत्मा+स्मृति+अहंकार =चित्त। चित्त के अवयवों को सनातन, सनंदन और सनक के नाम से भी जाना जाता है। क्षेत्र में स्थित चित्त से प्रक्षेपित चेतना ही आनंद खोजी चेतन सनतकुमार को जन्म देती है। इसका कार्य महाराज चित्रकेतु और महारानी कृतद्युति के बालक की प्रगति को शरीर पर्यन्त अक्षुण रखना है।
Hrishikesh Mishra
Hrishikesh Mishra 11 years 5 months ago
विविध परिस्थितियों में लोभ वश प्रारम्भ होने वाले अनेक कर्मों की छोटी-छोटी कडियाँ अनुभव के साथ किसी खास दिशा में अविच्छिन्न बढने लगती हैं। करोडों पहचान रूपी रानियाँ होने के बावजूद सिर्फ महारानी कृतद्युति से ही महाराज चित्रकेतु के एक बालक का जन्म होता है
Hrishikesh Mishra
Hrishikesh Mishra 11 years 5 months ago
कृतद्युति: स्मृति के उपर अंकित/annex 'नक' यह पहचान ही सनक नाम से विख्यात है। इन करोडो नत्थी पहचानों में क्रिया उत्पादक गुण, लोभ जनित भोग इच्छा वाली पहचानों में ही मुख्यत: देखा जाता है। कृतद्युति शब्द का यही आशय है