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केन्द्रीय संस्थाओं की गति निर्धारक भूमिका

Pace setting roles of central institutions
आरंभ करने की तिथि :
Jan 22, 2015
अंतिम तिथि :
Nov 01, 2015
00:00 AM IST (GMT +5.30 Hrs)
प्रस्तुतियाँ समाप्त हो चुके

केन्द्रीय संस्थाएं पथ-प्रदर्शक रही हैं और आमतौर पर उन्हें ...

केन्द्रीय संस्थाएं पथ-प्रदर्शक रही हैं और आमतौर पर उन्हें उत्कृष्टाता के केन्द्र के रूप में देखा जाता है। शैक्षणिक उत्कृष्टकता का संवर्धन और उसका विस्तार करने, और अपने पड़ोस की सामान्य जीवनशैली में सुधारात्मक कार्यकलाप करने, अन्य शैक्षिक संस्थाओं को आगे बढ़ाने तथा अपने क्षेत्रों में स्‍कूल शिक्षा में भी सहायक होने में सीएफआई से किस तरह की सहायता ली जा सकती है।

फिर से कायम कर देना
393 सबमिशन दिखा रहा है
Abid Alam Khan
Abid Alam Khan 11 साल 1 महीना पहले
विद्यार्थियों को सर्वेप्रथम निम्नलिखित श्लोक को व्यावहारिकता में लागू करना चाहिए:- "काक चेष्टं बकुल ध्यानं स्वान निद्रा तथैव च | अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थी च पञ्च लक्षणं ||"
Kamal ji
Kamal ji 11 साल 1 महीना पहले
गुरुजन बन्धुओं को सर्वप्रथम तो स्वतः यह संकल्प लेना होगा कि हम ‘सद्भाव एवं सद्व्यवहार प्रधान शिष्ष्ट एवं संयमित जीवन को ही आधार बना, चलते-चलाते हुए, ‘सत्यं प्रधान शिष्ट एवं संयमित जीवन को ही आधार बना, चलते-चलाते हुए, ‘सत्यं बद्, धर्मं चर’ (सत्य बोलें और धर्म पर रहें-चलें !) जो जीवन का सर्वोत्तम लक्ष्य है, को ही एकमात्र लक्ष्य बनाकर आगे-पढे़-पढ़ायेंगे बढ़े बढ़ाएंगे |
Kamal ji
Kamal ji 11 साल 1 महीना पहले
सुख्ुखार्थिर्ननः त्यजेतेत विद्या, विद्यार्थिर्ननः त्यजेतेत सुख्ुखम् । सुख्ुखार्थिर्ननः कुतुतो विद्या, विद्यार्थिर्ननः कुतुतो सुख्ुखम् । अर्थ:- सुख चाहने वाले को विद्या त्याग देना चाहिये, विद्या चाहने वाख चाहने वाले को विद्या त्याग देना चाहिये, विद्या चाहने वाले को सुख त्याग देना चाहिये । सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ और विद्या चाहने वाले को सुख कहाँ ?
Kamal ji
Kamal ji 11 साल 1 महीना पहले
विद्यार्थियों को सर्वेप्रथम निम्नलिखित श्लोक को व्यावहारिकता में लागू करना चाहिए:- "काक चेष्टं बकुल ध्यानं स्वान निद्रा तथैव च | अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थी च पञ्च लक्षणं ||"
Prakash KC
Prakash KC 11 साल 1 महीना पहले
गुरुजन बन्धुओं को सर्वप्रथम तो स्वतः यह संकल्प लेना होगा कि हम ‘सद्भाव एवं सद्व्यवहार प्रधान शिष्ष्ट एवं संयमित जीवन को ही आधार बना, चलते-चलाते हुए, ‘सत्यं प्रधान शिष्ट एवं संयमित जीवन को ही आधार बना, चलते-चलाते हुए, ‘सत्यं बद्, धर्मं चर’ (सत्य बोलें और धर्म पर रहें-चलें !) जो जीवन का सर्वोत्तम लक्ष्य है, को ही एकमात्र लक्ष्य बनाकर आगे-पढे़-पढ़ायेंगे बढ़े बढ़ाएंगे |
Prakash KC
Prakash KC 11 साल 1 महीना पहले
सुख्ुखार्थिर्ननः त्यजेतेत विद्या, विद्यार्थिर्ननः त्यजेतेत सुख्ुखम् । सुख्ुखार्थिर्ननः कुतुतो विद्या, विद्यार्थिर्ननः कुतुतो सुख्ुखम् । अर्थ:- सुख चाहने वाले को विद्या त्याग देना चाहिये, विद्या चाहने वाख चाहने वाले को विद्या त्याग देना चाहिये, विद्या चाहने वाले को सुख त्याग देना चाहिये । सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ और विद्या चाहने वाले को सुख कहाँ ?
Prakash KC
Prakash KC 11 साल 1 महीना पहले
विद्यार्थियों को सर्वेप्रथम निम्नलिखित श्लोक को व्यावहारिकता में लागू करना चाहिए:- "काक चेष्टं बकुल ध्यानं स्वान निद्रा तथैव च | अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थी च पञ्च लक्षणं ||"
Narendra Kumar Pal
Narendra Kumar Pal 11 साल 1 महीना पहले
ईमान-सच्चाई-संयम-सेवा से उसे सुचारुरूप से वहन करनी चाहिये । ‘दोष रहित सत्य प्रधान मुक्ति और अमरता से युक्त सर्वोत्तम जीवन विधान और अमन-चैन का सुखी समृद्ध समाज स्थापित करने हेतु गुरुजन बन्धुओं को सबसे पहली तथा सबसे बड़ी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेनी और उसे सुचारुरूप से वहन करनी चाहिये ।
Narendra Kumar Pal
Narendra Kumar Pal 11 साल 1 महीना पहले
विद्यार्थियों को सर्वेप्रथम निम्नलिखित श्लोक को व्यावहारिकता में लागू करना चाहिए:- "काक चेष्टं बकुल ध्यानं स्वान निद्रा तथैव च | अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थी च पञ्च लक्षणं ||"